Wednesday, 12 July 2017

किशनी


    किशनी बचपन से होशियार चालाक था, गांव वाले बचु (बचन सिंह) पदान को कहते भगवान किसी को औलाद दे तो तेरे जैसा, किशनी व्यवहार कुशल मिलनसार सबके दुख-सुख का साथी, क्या नाते-रिश्ते, क्या गाँव भर में ।   17वें बसंत में 12 वीं करने तक किशनी गाँव की पहचान बन गया था और भविष्य का हितेषी, अब बाप ने अपनी गरीबी का वास्ता दे आगे पढ़ाई से मना कर दिया और साथ में हाथ बांटने का वास्ता दे गया क्योंकि पदान जी के पास पुश्तेनी पदानचारी जमीन ही थी जो अब पुश्तेनी हेकड़ी मात्र थी आमदन के लिए पहाड़ी खेती-पाती बर्तमान जरुरतों पर घुटने टेक रही थी। गाँव में जो लोग सरकारी पौ-पगार वाले थे उनके बच्चे आगे पढने कस्बों में चले गए जो किशनी कि तरह थे भाग दौड़ कर फ़ौज में भर्ती हो रहे थे, किशनी की मन की दुविधा दिन रात ब्रह्माण्ड का चक्कर काट रही थी। भूमियाल देव देणु (कृपा) हुआ और किशनी भी भारतीय सेना में भर्ती हो गया।
ट्रेनिंग पूरी करने पर छुट्टी में माँ ने भी ईशारों में सास सुख लेने का संकेत दे दिया, बुबा मेरे से भी अब अकेले नहीं होता, उम्र तू देख ही रह है लाटा (लाडला) अब नोकरीं भी लग गयी सयाना हो गया कुछ दिन अपनी माँ को कमर सीधी करने दे इन सैंचारूं (अंग्रेजी हुकूमत के द्वारा मालगुजारी में मिले बड़े और समतल खेत) से। छुट्टी खत्म होने के बाद लड़की ढूंढने के दौर शुरू हुआ, बचु (बचन) सिंह की पुश्तेनी पदानचारी की धाक तो थी, साथ में लड़का गुणी और सरकारी नोकरी वाला, रिश्ते  मुंह मांगे आने लगे, पड़ोसी गांव के सम्भ्रान्त रौत (रावत)  परिवार से रिश्ता तय हुआ दादा फ़ौज से ऑर्डिनरी कैप्टन सेवारत और  बाप सरकारी ठेकेदार, लड़की ने भी जैसे तैसे इंटर कर बाप दादा की साख बचा ली थी कि रौत खानदान की च्येली है, लेकिन आधुनिक सब्ज-बाग़ नाक-नक़्शे चरम पर थे, कारण इकलोती बेटी होना और परिवार की आमदनी औरों से ठीक ठाक होना। किशनी साल भर बाद बॉर्डर से शादी के लिए छुट्टी आया और अपनी व्यवस्था आठ पेटियां ढोते घर आया, धूम धाम से शादी हुई, पदानचारी (मालगुजारी)  और रौत खानदान के रिश्ते व शादी की तारीफ इलाके में मुंह जुबानी वायरल थी। ब्वारी गांव में  नै-नै गोड़ी के  नो पूले घास वाली हो गयी, गाँव की जेठानी, देवरानी, ननद सबकी पसन्द किशनी की सरिता, क्योंकि दहेज़ में बहुत कुछ आ रखा था सबको ब्वारी ने मनपसंद गिप्ट जो किया।
शुरुवात के एक वर्ष ब्वारी (बहु) को पारम्पारिक बहु धर्म कंटकों की सेज पर गुजारना पड़ा सास की सास सुख तम्मना, तम्मना ही रही उस बेचारी का उषा से निशा तक का रेंगना काम नहीं हुआ, साल भर में ही बहु के पांव भारी हो गए, डिलीवरी से पहले किशनी छुट्टी आ गया पुत्र रत्न हुआ घर में खुशी की खुशबू थी, दो महीने छुट्टी पूरी होते ही सरिता ने साफ शब्दों में कह दिया बाल बच्चे वाले हो गए आगे की एजुकेशन भी देखनी है मेरे बस का नहीं तुम्हारी सैंचार के कोदा गोड़ने की मेरी सारी साहिलियाँ शहरों में शिफ्ट हो गयी, दबाव इतना बड़ा कि किशनी ने माटी के प्रेम पर पत्थर रखा और छ: महीने बाद ही डेरा-डम्फरा उठा शहर में किरायेदार बन गया, माँ ने खुशबगाट सुन एक महीने पहले ही बात-चीत बंद कर दी थी और जाने के दिन बोग (किनारे) लग गयी थी पर बाप  दुनियाँ की लाज के बसीभूत नाती को गोदी भरके शहर रखकर आया। दिन, हप्ते, महीने के साथ समय उड़ान भरता रहा, शहर में सरिता परफेक्ट  मोर्डन बन गयी और गांव का होशियार किशनी मजबूर किशन सिंह। सीमित आमदनी घर की बेसिक जरूरतों से ज्यादा साज-श्रृंगार, तेल-पाणी, घूमना-फिरना, फ्रेंडशिप इत्यादि में घिरमुन्डी खाने लग गया। परिवार भारतीय व्यवस्था के अनुरूप हम दो हमारे दो ही हुए, बच्चों की पढ़ाई को सरकारी केंद्रीय विद्यालय से ज्यादा प्राइवेट में तवज्जो दी गयी क्योंकि वर्चस्व के लिए अंग्रेजी जरूरी थी, सरिता अब मेडम पुकारे जाने पर गौरवान्वित थी, गांव में माँ पिता खोखली इज्जत पर खुश रहते थे कि उनकी संतान भी बाहर हैं लेकिन बुढ़ापे में नातियों के प्रेम की आग में रातें तप्त थी और खर्चे के नाम पर पुत्र ऋण अपंग, हाँ दादा-दादी आने जाने वालों के पास महीने में एक बार घर की दाल और सेर-तामी घी पोतों को भेज दिया करते थे, खून की पीड़ा असहनीय होती सहाब।
अब गांव का किशनी, किशन सिंह शहर वाला हो गया गाँव जाना तीन-चार साल में एक बार मुश्किल से कुछ जरूरी रश्म अदायगी तक सीमित हो गया, बाकी घर गाँव यार-आबत के सुख-दुःख के लिए समय के टोटे को बाहरी अवरोध बना लिया गया लेकिन असली अन्दर का अवरोध टका था, क्योंकी एक बार गांव जाना अतरिक्त वित्तीय बोझ बन रहा था। चार दीनी गांव की यात्रा में मेडम बच्चों का पिकनिकी मूड रिश्तों के भावनात्मक सदभाव (बिस्किट पैकेट व बीड़ी बंडल) पर भारी था। अब वह हरफनमौला किशनी नहीं अनर्गल जरूरतों की जोरू बन सर पर अनियंत्रित बेलगाम प्रतिष्ठा उठाये चल रहा था। घर गांव में भी नयें पौध पेड़ बन गए थे पुराने बृक्ष जिन्होंने प्यार की छांव में सींचा था कुछ टूट चुके थे कुछ ढोर बन गए थे। कुछ समय बाद माँ बाप भी अपनी सांसारिक यात्रा पूरा कर चले गए भाई-बहन, यार-रिस्तेदार अपनी गृहस्थी चक्र में निमग्न थे, सहाब संसार की रीति-नीती आउटपुट ईनपुट के सिधान्त पर काम करती है किशन का आउट पुट जीरो था इसलिए इनपुट का ब्लैंक होना लाजमी था कभी आउटपुट देने की कोशिश भी की थी पर सरिता मेडम के आगे घिंघा बना रहा। समय अपनी चाल से चलता रहा और किशन को पता नहीं चला कब नोकरी पूरी हो गयी, अब वह एक्स फौजी हो गया साथ में जमा पूंजी ने शहर में अपना घर होने की लाज बचा ली थी, बच्चे घर के आज तक के हवायीं हाई टेक माहौल के चलते पढ़ाई में ज्यादा अचीवमेंट नहीं कर पाए लेकिन प्राइवेट में जेब खर्चे की पूर्ति कर रहे थे शाम का खाना और सांसारिक दायित्व पेंशन पर आश्रित था। इसी जीवन क्रम में एक दिन हिम्मत बांध चौथी अवस्था में वह गांव की कूड़ी को संवारने और दुबारा 40 साल पीछे का किशनी बनने की ललक लिए गांव आया लेकिन अब तक समय अपने मजबूत पंखों के साथ इतनी दूर उड़ चला गया था कि गाँव में किशन को किशनी बोलने वाला कोई नहीं मिला वे चेहरे नदारद थे जो छुट्टी ख़तम होने के दिन गाँव की आखरी मुंडेर तक आंसुओं के संग सुखी शांति रहने का आश्रीवाद दे विदा करते थे हाँ आज भी गाँव में सब हैं लेकिन किशनी ताऊ नहीं शहर वाला किशन ताऊ बोलने वाले हैं, और आज इसी संबोधन ने किशनी को किशन सिंह प्रवासी, हाँ प्रवासी होने का अहसास कराया, फिर दो दिनी गाँव प्रवास के बाद वह शहर की बस की खिड़की से चलते-चलते दूर तक उस डांडी को निहारता रहा जहाँ उसकी आत्मा विचरण कर रही थी और प्रवासी शरीर बस के साथ शहर की और जा रहा था उस शहर को जहाँ की जीवनचर्या में वह अपनो से दूर नितांत दूर हो गया था खुद-व-खुद।

@ बलबीर राणा "अडिग"

1 comments:

sandeep kathait said...

भोती सुन्दर अर हम लोगों की सच्चाई