Wednesday, 19 July 2017

पहाड़ों के गांव


वाह ! कितना सुंदर मनोरम
आपार सुख होगा वहां
लेकिन उस पर्यटक को
नहीं पता
कितनी दुःख की वेदियों से
सजता ये चमन
खटकते रहते बाशिन्दे
जीवन के रंगों को सहेजने में
उषा से निशा भर
अपने गांव को
वैधव्य वेदना से बचाने को।

@ बलबीर राणा "अडिग"

Wednesday, 12 July 2017

किशनी


    किशनी बचपन से होशियार चालाक था, गांव वाले बचु (बचन सिंह) पदान को कहते भगवान किसी को औलाद दे तो तेरे जैसा, किशनी व्यवहार कुशल मिलनसार सबके दुख-सुख का साथी, क्या नाते-रिश्ते, क्या गाँव भर में ।   17वें बसंत में 12 वीं करने तक किशनी गाँव की पहचान बन गया था और भविष्य का हितेषी, अब बाप ने अपनी गरीबी का वास्ता दे आगे पढ़ाई से मना कर दिया और साथ में हाथ बांटने का वास्ता दे गया क्योंकि पदान जी के पास पुश्तेनी पदानचारी जमीन ही थी जो अब पुश्तेनी हेकड़ी मात्र थी आमदन के लिए पहाड़ी खेती-पाती बर्तमान जरुरतों पर घुटने टेक रही थी। गाँव में जो लोग सरकारी पौ-पगार वाले थे उनके बच्चे आगे पढने कस्बों में चले गए जो किशनी कि तरह थे भाग दौड़ कर फ़ौज में भर्ती हो रहे थे, किशनी की मन की दुविधा दिन रात ब्रह्माण्ड का चक्कर काट रही थी। भूमियाल देव देणु (कृपा) हुआ और किशनी भी भारतीय सेना में भर्ती हो गया।
ट्रेनिंग पूरी करने पर छुट्टी में माँ ने भी ईशारों में सास सुख लेने का संकेत दे दिया, बुबा मेरे से भी अब अकेले नहीं होता, उम्र तू देख ही रह है लाटा (लाडला) अब नोकरीं भी लग गयी सयाना हो गया कुछ दिन अपनी माँ को कमर सीधी करने दे इन सैंचारूं (अंग्रेजी हुकूमत के द्वारा मालगुजारी में मिले बड़े और समतल खेत) से। छुट्टी खत्म होने के बाद लड़की ढूंढने के दौर शुरू हुआ, बचु (बचन) सिंह की पुश्तेनी पदानचारी की धाक तो थी, साथ में लड़का गुणी और सरकारी नोकरी वाला, रिश्ते  मुंह मांगे आने लगे, पड़ोसी गांव के सम्भ्रान्त रौत (रावत)  परिवार से रिश्ता तय हुआ दादा फ़ौज से ऑर्डिनरी कैप्टन सेवारत और  बाप सरकारी ठेकेदार, लड़की ने भी जैसे तैसे इंटर कर बाप दादा की साख बचा ली थी कि रौत खानदान की च्येली है, लेकिन आधुनिक सब्ज-बाग़ नाक-नक़्शे चरम पर थे, कारण इकलोती बेटी होना और परिवार की आमदनी औरों से ठीक ठाक होना। किशनी साल भर बाद बॉर्डर से शादी के लिए छुट्टी आया और अपनी व्यवस्था आठ पेटियां ढोते घर आया, धूम धाम से शादी हुई, पदानचारी (मालगुजारी)  और रौत खानदान के रिश्ते व शादी की तारीफ इलाके में मुंह जुबानी वायरल थी। ब्वारी गांव में  नै-नै गोड़ी के  नो पूले घास वाली हो गयी, गाँव की जेठानी, देवरानी, ननद सबकी पसन्द किशनी की सरिता, क्योंकि दहेज़ में बहुत कुछ आ रखा था सबको ब्वारी ने मनपसंद गिप्ट जो किया।
शुरुवात के एक वर्ष ब्वारी (बहु) को पारम्पारिक बहु धर्म कंटकों की सेज पर गुजारना पड़ा सास की सास सुख तम्मना, तम्मना ही रही उस बेचारी का उषा से निशा तक का रेंगना काम नहीं हुआ, साल भर में ही बहु के पांव भारी हो गए, डिलीवरी से पहले किशनी छुट्टी आ गया पुत्र रत्न हुआ घर में खुशी की खुशबू थी, दो महीने छुट्टी पूरी होते ही सरिता ने साफ शब्दों में कह दिया बाल बच्चे वाले हो गए आगे की एजुकेशन भी देखनी है मेरे बस का नहीं तुम्हारी सैंचार के कोदा गोड़ने की मेरी सारी साहिलियाँ शहरों में शिफ्ट हो गयी, दबाव इतना बड़ा कि किशनी ने माटी के प्रेम पर पत्थर रखा और छ: महीने बाद ही डेरा-डम्फरा उठा शहर में किरायेदार बन गया, माँ ने खुशबगाट सुन एक महीने पहले ही बात-चीत बंद कर दी थी और जाने के दिन बोग (किनारे) लग गयी थी पर बाप  दुनियाँ की लाज के बसीभूत नाती को गोदी भरके शहर रखकर आया। दिन, हप्ते, महीने के साथ समय उड़ान भरता रहा, शहर में सरिता परफेक्ट  मोर्डन बन गयी और गांव का होशियार किशनी मजबूर किशन सिंह। सीमित आमदनी घर की बेसिक जरूरतों से ज्यादा साज-श्रृंगार, तेल-पाणी, घूमना-फिरना, फ्रेंडशिप इत्यादि में घिरमुन्डी खाने लग गया। परिवार भारतीय व्यवस्था के अनुरूप हम दो हमारे दो ही हुए, बच्चों की पढ़ाई को सरकारी केंद्रीय विद्यालय से ज्यादा प्राइवेट में तवज्जो दी गयी क्योंकि वर्चस्व के लिए अंग्रेजी जरूरी थी, सरिता अब मेडम पुकारे जाने पर गौरवान्वित थी, गांव में माँ पिता खोखली इज्जत पर खुश रहते थे कि उनकी संतान भी बाहर हैं लेकिन बुढ़ापे में नातियों के प्रेम की आग में रातें तप्त थी और खर्चे के नाम पर पुत्र ऋण अपंग, हाँ दादा-दादी आने जाने वालों के पास महीने में एक बार घर की दाल और सेर-तामी घी पोतों को भेज दिया करते थे, खून की पीड़ा असहनीय होती सहाब।
अब गांव का किशनी, किशन सिंह शहर वाला हो गया गाँव जाना तीन-चार साल में एक बार मुश्किल से कुछ जरूरी रश्म अदायगी तक सीमित हो गया, बाकी घर गाँव यार-आबत के सुख-दुःख के लिए समय के टोटे को बाहरी अवरोध बना लिया गया लेकिन असली अन्दर का अवरोध टका था, क्योंकी एक बार गांव जाना अतरिक्त वित्तीय बोझ बन रहा था। चार दीनी गांव की यात्रा में मेडम बच्चों का पिकनिकी मूड रिश्तों के भावनात्मक सदभाव (बिस्किट पैकेट व बीड़ी बंडल) पर भारी था। अब वह हरफनमौला किशनी नहीं अनर्गल जरूरतों की जोरू बन सर पर अनियंत्रित बेलगाम प्रतिष्ठा उठाये चल रहा था। घर गांव में भी नयें पौध पेड़ बन गए थे पुराने बृक्ष जिन्होंने प्यार की छांव में सींचा था कुछ टूट चुके थे कुछ ढोर बन गए थे। कुछ समय बाद माँ बाप भी अपनी सांसारिक यात्रा पूरा कर चले गए भाई-बहन, यार-रिस्तेदार अपनी गृहस्थी चक्र में निमग्न थे, सहाब संसार की रीति-नीती आउटपुट ईनपुट के सिधान्त पर काम करती है किशन का आउट पुट जीरो था इसलिए इनपुट का ब्लैंक होना लाजमी था कभी आउटपुट देने की कोशिश भी की थी पर सरिता मेडम के आगे घिंघा बना रहा। समय अपनी चाल से चलता रहा और किशन को पता नहीं चला कब नोकरी पूरी हो गयी, अब वह एक्स फौजी हो गया साथ में जमा पूंजी ने शहर में अपना घर होने की लाज बचा ली थी, बच्चे घर के आज तक के हवायीं हाई टेक माहौल के चलते पढ़ाई में ज्यादा अचीवमेंट नहीं कर पाए लेकिन प्राइवेट में जेब खर्चे की पूर्ति कर रहे थे शाम का खाना और सांसारिक दायित्व पेंशन पर आश्रित था। इसी जीवन क्रम में एक दिन हिम्मत बांध चौथी अवस्था में वह गांव की कूड़ी को संवारने और दुबारा 40 साल पीछे का किशनी बनने की ललक लिए गांव आया लेकिन अब तक समय अपने मजबूत पंखों के साथ इतनी दूर उड़ चला गया था कि गाँव में किशन को किशनी बोलने वाला कोई नहीं मिला वे चेहरे नदारद थे जो छुट्टी ख़तम होने के दिन गाँव की आखरी मुंडेर तक आंसुओं के संग सुखी शांति रहने का आश्रीवाद दे विदा करते थे हाँ आज भी गाँव में सब हैं लेकिन किशनी ताऊ नहीं शहर वाला किशन ताऊ बोलने वाले हैं, और आज इसी संबोधन ने किशनी को किशन सिंह प्रवासी, हाँ प्रवासी होने का अहसास कराया, फिर दो दिनी गाँव प्रवास के बाद वह शहर की बस की खिड़की से चलते-चलते दूर तक उस डांडी को निहारता रहा जहाँ उसकी आत्मा विचरण कर रही थी और प्रवासी शरीर बस के साथ शहर की और जा रहा था उस शहर को जहाँ की जीवनचर्या में वह अपनो से दूर नितांत दूर हो गया था खुद-व-खुद।

@ बलबीर राणा "अडिग"

Tuesday, 13 June 2017

आतंकवाद के प्रति सतर्कता, जागरूकता और क्रियानवयन

संदिग्द वस्तु एवम आदमी के विषय में हमारे देश में अभी तक कोई आम सतर्कता और जागरूकता नहीं है, जहां देश के अंदर अपने को सम्भ्रान्त सुशिक्षित कहने वाले व्यक्तियों में भी आतंकवादियों के खतरे के प्रति अवेर्नेश लागभग ना के बराबर है तो आम जनता का क्या कहना, हमारे देश में इतने खतरनाक मुद्दे पर सतर्कता एवम जागरूकता नगण्य के बराबर है यह  मात्र कुछ विज्ञापनों, हवाई, रेलवे व कुछ बस स्टेशनो और सरकारी कार्यक्रमो की इतिश्री तक सीमित है, बाकी आम जगह बाजार, शॉपिंग मॉल, रेस्तां, सिनेमा हॉल, भीड़ भाड़ वाली जगह, मेले, उत्सव और धार्मिक स्थलों पर  सिफर है, देश की 90 फीसदी आम शहरी को पता ही नहीं कि अगर आतंकवादी वारदात मेरे सामने हो जाय तो मुझे क्या करना है और आज भी  देश में लावारिस वस्तु का मिलना किश्मत या तोहफा मिलने का नजरिया ज्यों का त्यों है या किसी की भलाई के लिए वस्तु को संभाल के रखने की मानवता विद्यमान है।
    
       वैश्विक पटल पर चल रही चरम आतंकी घटनायें जिनका वर्तमान trained बॉम्बिंग (IED ब्लास्ट), PBIED (personal Born  IED) अर्थात सुसाईड बॉम्बिंग, VBIED (Vehicle Born IED) बारूद से लैस गाड़ी जिसे IED की तरह इस्तेमाल करना या आत्मघाती की तरह, भीड़ के बीच आर्म्ड अटैक, या स्टैंड ऑफ अटैक इत्यादि नयें-नयें तरीकों से मानव त्रासदी को अंजाम दिया जा रहा है और इनोसेंट जनता बेमौत कीड़े मकोड़ों की तरह मारी जा रही है। IED धमाकों औऱ वीभत्स आर्म्ड आतंकी घटनाओं से हमारा देश भी अछूता नहीं है देश का आधा हिस्सा जम्मु कश्मीर, नार्थ ईष्ट और नक्षल प्रभावित क्षेत्र (रेड कॉरिडोर) जहां पूर्ण प्रभावित है वहीं देश की राजधानी व आर्थिक राजधानी सहित देश का बाकी हिस्सा आंशिक रूप से प्रभावित है। देश के अंदर बहुआतयात मात्रा में ANE (anty nationalist elements) की मौजूदगी है ये कब कहाँ घटना को अंजाम दे दें , देश की खुपिया एजेंसीज और सुरक्षा बलों के लिए चुनौती बनी है।
     कहते हैं जब तक आदमी को ठोकर नहीं लगती वह संभालता नहीं परंतु ऐसा नहीं कि हमारे देश पर ठोकर नहीं लगी 26/11 जैसे जघन्य आत्मघाती हमला मुंबई सीरियल बम्ब ब्लास्ट,  सुकुमा, दंतेवाड़ा आदि जैसे IED हमलों से निर्दोशों के खून के धब्बे अभी सूखे नहीं औऱ आये दिन इन घटनाओं से मानवता की आत्मा कराह उठती है, किसी व्यक्ति विशेष के परिपेक्ष में देखा जाय तो कहते हैं दर्द उसी को होता जिसका मरता है यही आम जन भावना देश के आम आदमी पर हावी है जिस परिवार का खेवनहार, चिराग या प्रिय ऐसी घटनाओं का शिकार हुआ है चाहे उसमें सुरक्षाबल हो या आम निर्दोष उन परिवारों की आत्मा में झांके तो फिर पता चलेगा जीवन जीते जी कैसे कष्टप्रद जहनुम बन जाता है। आज हमारे देश में सरकार व सम्बंधित विभागों और मीडिया द्वारा आतंकी घटनाओं की जानकारी सूक्ष्म रूप में दी जाती है और घटना के बाद हाईप्रोफाइल मीटिंग,  डिबेट, सेमिनार संगोष्ठियां, रिसर्च और प्रिवेंशन की चिन्ता चिता की आग के साथ बुझ जाती है इसे देश का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा। विश्व की बृहद लोकतंत्र की स्वतंत्र मीडिया का हाल ये है कि आम जनजागरण और राष्ट्र रक्षा के मुद्दों को छोड़ कर किसी एक राजनीतिक पार्टी की गोद में बैठ चाटुकारिता से जनता को दिग्भ्रमित करती आयी है और सोशियल मीडिया पर भ्रम फैलाने वालों का जाल बना है ऐसे में इस संवेदनशील मसले पर सतर्कता और जागरूकता आम जन के जीवन व्यवहार में कैसे लाया जाय यह देश के बुद्धिजीवियों और नीतिनियन्ताओं के लिए मंथन व चुनोती का काम है।  ISIS, अलकायदा जैसे दुर्दांत वैश्विक आतंकी संघठनो का अंकुर देश में अंकुरित हो चुका है और इस  अंकुर को नष्ट करने में  आम जनता की सतर्कता और जागरूकता सुरक्षाबलों के लिए एक बडा कारगर हथियार साबित हो सकता है व देश के अंदर मौजूद आतंकियों के सफेद संरक्षकों के मंसूबों को धवस्त किया जा सकता है। आज जिस प्रकार देश की राजनीति पतितता  कुर्सी की भूख के चलते व्यग्र हुई है और विरोध का उग्र तरीका इस्तेमाल किया जा रहा है ऐसी वारदातों और उग्र लोगों की भावनाओं का आतंकी आराम से फायदा उठा सकते है इसलिए देश में ऐसे हिंसक प्रदर्शनों के लिए कड़े कानून की जरूरत है। सुरक्षा बलों के साथ आम जनता को चाहिए कि ऐसी भीड़ का बारीकी से अवलोकन  करें कि इस प्रदर्शन की आड़ में कोई देश का दुश्मन बड़ी अनहोनी न कर दे यह एक भारतीय होने के नाते अपने हित के संघर्ष के साथ देश हित और जनहित के लिए आवश्यक है ताकि कोई बड़ी जनहानि होने से बचाया जा सके।
     वर्तमान में  सूचना और सोशियल मीडिया क्रांति का प्रभाव जहां एक ओर ऐसे जघन्य आतंकी घटनाओं के लिए ईँधन का काम कर रहा है वहीं इन माध्यमो को सतर्कता व बचाव प्रक्रिया (Prevention Measure) के रूप में बखूबी इस्तेमाल किया जा सकता। आज स्मार्टफोन लगभग देश की आधा से अधिक जनता के हाथों में है इन स्मार्ट फोनों के माध्यम से संदिग्द व्यक्ति और डिवाइज (वस्तु) की सही स्थिति और उपस्थिति सुरक्षा एजेंसीज के साथ अन्य लोगो को कम समय में  पहुंचाई जा सकती है लेकिन ध्यान रहे भ्रामकता से बचा जाय और न ही हर खबर को भ्रम समझा जाय , विश्व के कतिपय देशों में घटित आतंकी घटनाओं का कम प्रभाव और कम समय में आतंकियों के खातमे में वहां की जनता की अवेर्नेश काम आयी है उसमें जनवरी 16 पेरिस सीरियल आर्म्ड अटैक हो या अभी हाल में हुए मेनचेस्टर हमला आदि शामिल हैं। आज के माहौल को देखते हुए चाहिए कि देश के हर नागरिक विशेषकर महानगरों में रहने वाले व्यक्ति के जेब में अनिवार्य एक दिशा निर्देश पुष्तिका दी जाय और हर एक सार्वजनिक जगह पर पोस्टर बेनर और ऑडियो विज़ुअल जागरूक संदेश दिया जाय ताकि आम आदमी की सोच से यह वेचारा और हर लावारिस वस्तु किश्मत से मिली या मेरा क्या छोड़ो का नजरिया बदला जा सके।
      आतंकवाद और नक्षलवाद प्रभावित क्षेत्रों में हर दिन एक न एक धमाका हो रहा है और कोई न कोई इनोसेंट चपेटा जा रहा है फिर भी वहां के व्यक्ति विशेष और सरकारी सतर्कता व जागरूकता में कोई बदलाव नहीं आ रहा है जिसका मर रहा है वह रो रहा है जो बच गया अल्लाह की रहमत समझता है। अगर हर व्यक्ति किसी संदिग्द वस्तु के बारे में अवेर्नेश रखता है तो समय रहते एक बड़ी घटना को रोक जा सकता है या उसके दुष्प्रभाव को कम किया जा सकता है। मैं तो यह मांग करूँगा की ऐसे क्षेत्रों में अन्यवार्य रूप से बतौर IED awareness ट्रेनिंग दी जानी चाहिए। अंत में मैं देश हित और जनहित के लिए हमारी सिखलाई व मेरे व्यक्तिगत कुछ  सुझाव हैं जिन पर अमल किया जाय तो आज आक्रांत इस चैलेंज का मुक़ाबला किया जा सकता और अपने परिवार को बचाने के साथ देश के निर्दोश नागरिकों को बचाने का पुण्य कमाया जा सकता है।
आम व्यक्ति विशेष को ध्यान देने और करने वाली बातें:-
1. कहीं भी किसी भी लावारिस चीज को न छुएं और उसे संदिग्द मान कर जल्द से जल्द नजदीक सुरक्षा एजेंसियों को सूचित करे ये आम तौर पर लालच वाली होती है जैसे लेपटॉप, टेब, मंहगा बैग, सूटकेश, घड़ी , ट्रांजिस्टर, मोबाइल फोन, टॉर्च, पॉवर बैंक, खाने का टिफीन, खाने की वस्तु बच्चों के खिलौने इत्यादि।
2. ऐसी चीजों या जगह को इग्नोर न करें जो आपको अपनी वास्तविक स्थिति से हट कर अलग थलग लगे।
3. अगर आप रिमोट एरिया से हो या वहां किसी कार्य को अंजाम दे रहे हो तो किसी भी रस्ते को सेफ न माने कहीं अनप्रोपर बिजली की तार, ट्रिप वायर, कोई टिन, मरा हुआ जानवर, पत्थरों की ढेरी, खुदी मिट्टी , दबी घास इत्यादि अनप्रोपर लगती है तो उसे संदिग्द माने।
3. भीड़ भाड़ वाले इलाके में लावारिस खड़ी साइकिल, मोर्टर साइकिल, कार इत्यादी वाहन कोई छोड़ जाता या कोई व्यक्ति इन वाहनों में कोई चीज रख के तुरंत निकल जाता हो तो सुरक्षाबलों को तुरंत जितना जल्दी हो सूचित करें।
4.  कहीं किसी बड़े आयोजन जैसे रैली, सांस्कृतिक कार्यक्रम, खेल प्रतियोगिता, धार्मिक आयोजन, कोई सेरेमनी इत्यादि होने से पहले या दौरान संदिग्द व्यक्ति टोह लेता मिले, ऐसे व्यक्ति के हाव भाव, नजर,  व्यवहार, पहनावे जैसे बड़े और ज्यादा कपड़े, बड़ा बैग व अलग हरकत से अनुमान लगाया जा सकता वैसे यह अनुमान लगाना आम व्यक्ति के लिए मुश्किल है लेकिन शकिया नजर और थोड़ा मनोविज्ञान का इस्तेमाल करके अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है ध्यान रहे आपने केवल शक करना है छानबीन नहीं।
5. किसी भी प्रकार के वाहन को कोई लापरवाही और अन्धाधुंन्द स्पीड में चला रहा हो और रोड सेफ्टी प्रवेंशन का ध्यान न रख कर चल रहा हो उसकी रिपोर्ट तुरंत पुलिस या सेक्युरिटी फोर्स को दें।
6. कोई व्यक्ति कहीं भी सुरक्षा जांच से बच निकलने की कोशिश कर रहा हो या बच निकल गया हो इस प्रकार का व्यक्ति पक्का क्राईमर है बसर्ते वह आतंकी न हो।
7. कोई व्यक्ति अनप्रोपर तरीके या कोड वर्ड में बात कर रहा हो या किसी पब्लिक साईबर बूथ में रोज कॉल या इंटरनेट सर्फिंग करता हो उसे भी संदिग्द माने और निगरानी रखें।
संक्षेप में कहें तो आतंकवाद की तकनिकी इतनी बृहद और आधुनिक है कोई भी वस्तु या जगह नहीं बची जिसका इस्तेमाल आतंकियों द्वारा IED के लिए न किया गया हो, जहां सुरक्षा एजेंसियां एक का तोड़ निकालती आतंकवादी एक कदम आगे नई तकनीकी को ईजाद करते आये हैं।
सुरक्षाबल के सदस्य को ध्यान व अमल में लाने वाली बातें:-
1. देश के सुरक्षा तंत्र से जुड़े सभी सैनिक, अर्धसैनिक, केंद्रीय पुलिस बल,  राज्य पुलिस बल व गुप्चर संस्थाओं के मेम्बरस का नैतिक दायित्य है कि उपरोक्त सभी बातों का ध्यान देने के साथ अमल में लाना अन्यवार्य है साथ ही  खुद भी सर्तक रहना होगा और अपने आस-पास के लोगों को भी सतर्क रखन है और जानकारी देकर जागरूक करना होगा चाहे डियूटी, आकस्मिक डियूटी या छुट्टी पर ही क्यों न हो अपनी शकिया निहाग हमेशा दैडाते रहना चाहिए।
2. मेरा तो क्या है चुप-चाप निकले का रवय्या छोड़ना जरूरी है।
3. किसी अनप्रोपर जगह जहां तैनाती न हो या छुट्टी पर हो ऎसे स्थानों पर फिजिकल पहल से ज्यादा वहां के नजदीकी सुरक्षा एजेंसीज को सही इतला देना और सहयोग करना हितकर होगा।
4. बिना जानकारी, अधूरी जानकारी या बिना RSP (रेंडरिंग सेफ प्रोसीजर) अर्थात इलाके को बम्ब थ्रेट से सुरक्षित करने वाले इक्विपमेंट के बिना किसी संदिग्द वस्तु को न छेड़ें या कार्यवाही न करे यानी डेड हीरो न बने।
5. बिना हुकम के सस्पेक्टिव डिवाईस पर कार्यवाही न करें और बम्ब डिस्पोजल स्क्वॉड को इतला करें व उत्सुकता से बचें।
6. सिविल जनता को इलाके से सेफ करें, भीड़ इकठ्ठा न होने दें और जनता को भरोसा दिलाएं दहशत न फैलाएं दहशत फैलाने से रोकें जनता जल्दी भगदड़ मचाती है जिससे ज्यादा जान माल का नुकशान होता है।
अन्य सरकारी महकमे और प्राइवेट संस्थाओं द्वारा उठाये जाने वाले कदम:-
 देश की इंटेलिजेंस एजेंसीज और सुरक्षा बलों द्वारा हरसम्भव पर्याप्त कार्यवाही की जाती रही है और करते आये हैं लेकिन इनके अलावा गैर गुप्चर या गैर सुरक्षा एजेंससियों व प्राइवेट संस्थाओं को निम्न आवश्यक कदम उठाने  की जरूरत है।
1. सभी पब्लिक प्लेस पर पोस्टर बेनर और हर समय अनाउंस से सर्तकता संदेश व सुरक्षित बचाव की कार्यवाही को ब्रॉड कास्ट किया जाय।
2. प्रिंट मीडिया दैनिक, साप्ताहिक, मासिक समाचार पत्र,  न्यूज लेटर, मैगजीन आदि में नित्य आतंकवादी घटनाओं से सबंधित सतर्कता व प्रवेंशन मेजर कॉलम कॉमर्शियल बिज्ञापन की तरह अन्यवार्यता से छपवाये जाय।
2.  इलेक्ट्रॉनिक मीडिया आकाशवाणी, एफ एम रेडियो, टीवी इत्यादि में हर कॉमर्शियल ब्रेक में सतर्कता ऐड अनिवार्य रूप से प्रसारित किये जाय।
3. सोशियल मीडिया में सरकार के वैध अकाउंट से नित्य अलर्ट और प्रवेंशन मेजर पोस्ट करना व उचित खबर व सजेशन देने वालों को ईनाम देने का प्रबंध किया जाय।
4. सभी प्रकार के प्राइवेट पब्लिक प्लेस जैसे शॉपिंग मॉल , रेस्तां, पिकनिक हब, धार्मिक स्थल, सिनेमा हॉल, बड़े मार्केट, मेले, रैलियां व खेल स्थलों इत्यादि जमबाड़े की जगह पर जिम्मेवार संस्था द्वारा अलर्ट, डू और डोनट्स लिखित, ऑडियो विज़ुअल रूप में नित्य प्रसारित किया जाय और पर्याप्त सुरक्षा चैकिंग स्क्वॉड की नियुक्ति की जाय।
5. सभी प्रकार के पब्लिक वाहनों पर सर्तकता विज्ञापन चिपकाए जाय।
6. स्वेच्छिक स्वयं सेवी संस्थाओं को जनजागरूकता अभियान के लिए प्रोत्साहित किया जाय।
7. देश के अंदर एक हेल्प लाईन नंबर और मोबाईल ऐप इस प्रकार की घटना की सूचना के लिए जारी किया जाय।
उपरोक्त सर्वत्र जगहों पर आतंकवाद सर्तकता संदेश और निरोधक कार्यवाही करना या होने का मेरा मतलब देश के अंदर दहशत फैलाना या दहशत का माहौल बनाना नहीं बल्कि हर व्यक्ति के मसल मेमोरी में हर समय खुद चौकन्ना रहना और दूसरे को  रखना है ताकि अपने देश को इराक सीरिया बनाने से रोका जा सके। देश के सबसे निन्म वर्ग के वासिंदा जो अभी सूचना क्रांति से नहीं जुड़ा है तक ये संदेश पहुंचना जरूरी है कि खुद की उन्नति जानसलामती और राष्ट्र अखंडता के लिए उसका थोड़े से पैसों का लालच खतरनाक हो सकता है साथ ही देश के नागरिक को ये समझना होगा कि कोई भी भड़काऊ संदेश कट्टर धार्मिक उन्माद से कैसे बच सकते हैं उपद्रवी तत्व आम गरीब को ही हथियार बनाता हैं। एक रिक्से और ऑटो वाले को बखूबी पता हो कि मेरे वाहन में छूटा हुआ समान बैग और बैठा हुआ व्यक्ति संदिग्द हो सकता है उसे अपनी सुरक्षा एजेंसी पर इतना भरोसा हो कि वह बिना लेट लतीफे के निर्भीक हो कर सुरक्षा एजेंसी को सूचित करें इसके लिए सुरक्षा एजेंसियों को अपनी पहले वाली दमन नीति से उठकर जनता से कैसे  सहयोग लिया जा सकता है के लिए कदम उठाने होंगे तभी आतंकवाद रूपी दानव के कहर से विशाल भारतवर्ष को बचाया जा सकता है।

जय हिन्द
#राष्ट्रहित_में_जारी

लेखक :- बलबीर राणा "अडिग"
चमोली उत्तराखंड

आदमी के विषय में हमारे देश में अभी तक कोई आम सतर्कता और जागरूकता नहीं है, जहां देश के अंदर अपने को सम्भ्रान्त सुशिक्षित कहने वाले व्यक्तियों में भी आतंकवादियों के खतरे के प्रति अवेर्नेश लागभग ना के बराबर है तो आम जनता का क्या कहना, हमारे देश में इतने खतरनाक मुद्दे पर सतर्कता एवम जागरूकता नगण्य के बराबर है यह  मात्र कुछ विज्ञापनों, हवाई, रेलवे व कुछ बस स्टेशनो और सरकारी कार्यक्रमो की इतिश्री तक सीमित है, बाकी आम जगह बाजार, शॉपिंग मॉल, रेस्तां, सिनेमा हॉल, भीड़ भाड़ वाली जगह, मेले, उत्सव और धार्मिक स्थलों पर  सिफर है, देश की 90 फीसदी आम शहरी को पता ही नहीं कि अगर आतंकवादी वारदात मेरे सामने हो जाय तो मुझे क्या करना है और आज भी  देश में लावारिस वस्तु का मिलना किश्मत या तोहफा मिलने का नजरिया ज्यों का त्यों है या किसी की भलाई के लिए वस्तु को संभाल के रखने की मानवता विद्यमान है।

Saturday, 11 March 2017

आयी होली


पूरब से निकली किरण
अधरों पर मुस्कान लिए बोली
उठो अलस भगाओ, देखो बाहर
सजधज कर आयी होली।

अबीर गुलाल पिचकारी लेकर
खड़ी है हुरियारोँ की टोली
उल्लास ही उल्लास, देखो झांककर
बासंती फुहार संग आयी होली।

छोड़ो कल की बातें, गले मिलें
मेरा- तेरा अब तक बहुत हो ली
मन का विश्वास दिलों में प्रेम
भाईचारा लेकर आयी होली।

रंगी है धरती रंगे हैं चौक चौबारे
सजी बिलग रंगों की एक रंगोली
मधुमास है पकड़ो, प्रेम झर रहा
आंनद की प्याली पिलाने आयी होली।


रचना: बलबीर राणा 'अडिग'
12 मार्च 2017

Saturday, 11 February 2017

आगे और भी है



क्षितिज के पार जहाँ और भी है
तारों से ऊपर आसमाँ और भी है,
मत समझ अभी को आखरी पड़ाव
तेरी हस्ती की मंजिलें आगे और भी है।

दर्द और सिकन बहुत है इस जहाँ में
टीस जो मिलने वाली आगे और भी है,
देखा है जो रंग शबाब अब तक यहाँ
रंगीनियों से भरा चमन आगे और भी है।
मत घबरा दोस्त चंद रेतीले टीलों से
कोशों रेगिस्तान पार करना और भी है
ये तो एक छोटा इम्तिहां था जिंदगी का
मंजिल के लिए महासंग्राम और भी है।
लम्बे प्रेमालिंगन के बाद भी दिल टूटते देखे
चंद लम्हों में दिलदार बन बैठे और भी हैं,
खप जाती है उम्र इस इश्किया मिजाज समझने में
याद रहे बशंत के बाद तपती गर्मी का दौर भी है।
कर गुमान हुस्ने जवानी का यूँ खुली सड़क में
कामदेवों की भरमार गली में और भी है,
ठिकाने बदलने वालों की नक़ल महँगी पड़ेगी
उनके आशियाने तड़ी पार और भी है।

@ बलबीर राणा 'अड़िग'



Tuesday, 3 January 2017

बुझती अग्नि की उमंग


उजली हैं दिशाएं छंटने लगा कुहासा
कुचली हुई शिखाओं की जगने लगी आशा
कोई जरा बता दे ये कैसे हो रहा
धुंधली तिमिर का तेज क्यों चमक रहा
अपसय की झालर धूमिल पड़ गयी
आकंठ झोपडियों की माला दिप्त हो गयी
किस दाता ने संदीप्ति को जिला दीया
बुझती हुई शिखा को संजीवनी पिला दिया
इस वतन के हित का अंगार मांगता हूँ
सो रही जवानियों में ऐसा ज्वार मांगता हूँ।

बैचैन थी हवाएं, चहुँ और हुदंगड़ था
सालीन किश्ती को बबंडर का डर था
मँझदार में था केवट ओझल था किनारा
उछलती लहरों के कुहासे में चमका सितारा
नभ का अनल लिख दे सदृष्ट हमारा
भगवन इसी तरह भगा देना अँधेरा
तेरी किरण से ऐसा ही संग्राम मांगता हूँ
ध्रुव पर भारत की यही  पहचान चाहता हूँ।

कुचक्र के पहाड़ से अवरुद्ध थी गंग धारा
शिथिल था बलपुंज केसरी का वेग सारा
अग्निस्फुलिंग रज  ढेर होने के कगार था
स्वर्ण धरा का यौवन अँधेरे में भटक रहा था
निर्वाक था हिमालय यमुना सहमी हुई थी
निस्तब्धता थी निशा, दुपहरी डरी थी
ऐसा ही विकराल भीमसेन का माँगता हूँ
भ्रष्टाचारियों के जिगर यही भूचाल माँगता हूँ।

मन की बंधी उमंगें फिर पुलकित हो रही हैं
अरमान आरजू की बरात सजित हो रही हैं
भीगी दुःखी पलों की रातें सुनिन्द सोने लगी
 विक्रमादित्य की वसुन्धरा मुश्कराने लगी
क्या ब्राह्मण क्या ठाकुर क्या कहार कुर्मी
लाज के मारे कीचड़ में लिपटी थी लक्ष्मी
गर्त में पड़ी मानवता का उत्थान माँगता हूँ
शासक अभिमन्यु शिवाजी तूफान माँगता हूँ।

भर गया था भयंकर भ्रष्ट टॉक्सिन हर रग में
बेचैन थी  जिन्दगी  घर घर में
ठहरी हुई साँस को रस्ता मिलने लगा
गरीब के घर आशा का दीप टिमटिमाने लगा
लेकिन राजनीति के इन शकुनी पांसों से
निजात मिलना आसान नहीं लगता
असंख्य दुर्योधनों के संग कुरुक्षेत्र में
कटने का संशय कम नहीं लगता
प्यारी जन्मभूमि के हित वरदान माँगता हूँ
कृष्ण सदिस ऐसा ही भगवान माँगता हूँ।

रचना : बलबीर राणा 'अडिग'
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Friday, 30 December 2016

एक आहुति श्रद्धा की



जिस राह गुजरे हों शहीद उस राह की  माटी चन्दन है,
खप गए जो देश के लिए उन माटी पुत्रो को वंदन है।

राष्ट्र रक्षा के खातिर, सीना जिनका कवच बना रहता
नाम नमक निशान को जो स्व सर्वस्व न्यौछावर करता
जान हथेली पर रख कर जो फिरते ओर-छोर सारा
जिनकी  तप तपस्या से  सुख समृद्धि में वतन हमारा
मोती बन जाता जो कर्म उस कर्म को शत शत नमन है
खप गए जो देश के लिए उन माटी पुत्रो को वंदन है।

जिनकी रगों में रुधिर देश भक्ति का अविरल बहता रहता
जय घोष जयहिंद का करता गीत हरपल वंदेमातरम गाता
जिनकी राह गिरी राज नतमस्तक हो ठहरती हो गंगा धारा
नहीं डिगता ईमान बर्फीले बबंडर में वही ईमान हो सहारा
साधना जिनकी रच गए भारत भाग्य शादहत दे गया अमन है
खप गए जो देश के लिए उन माटी पुत्रो को वंदन है।

जिनकी अडिगता से अडिग है आज भी हिमालय
जिनके श्रम साध्य से बनी है ये धरती शिवालय
 तिरंगा लहराते हुए  जिनकी हर पल याद दिलाता
अमर ज्योत लपलपाते गौरव गाथा उनकी सुनाता
धन्य हो नींव की ईंटो  जिनपर बना भारत भवन है
खप गए जो देश के लिए उन माटी पुत्रो को वंदन है।

हम नहीं लौटा सकते उनका जीवन
ना दे सकते उन जननियों की हंसी
मांग भर नहीं सकते विरांगनाओं की
ना लौटा सकते उन अबोधों की ख़ुशी
एक आहुति श्रद्धा की उनके नाम सूना जिनका चमन हैं
खप गए जो देश के लिए उन माटी पुत्रो को वंदन है।

रचना : बलबीर राणा 'अडिग'