Sunday, 18 February 2018

कुर्सी पर चूं नहीं हुई



रहा जीवन सदियों से कुर्सी की दासी
महल अजीर्ण, बाहर भूखी उबासी
जन घिसता रहा पिसता रहा
पर कुर्सी तुझ पर चूं नहीं हुई।

बुद्धि लिखती रही, बेबसी बकती रही
लाचार मरता रहा ईमानदार खपता रहा
बाहर नगाड़े फूट गए बज-बज कर
लेकिन कुर्सी तुझ पर चूं नहीं हुई।

साल बदलते रहे सार बदलता रहा
कुर्सी पर आदम से, आदमी बदलते रहे
तख्त बदलता रहा ताज बदलता रहा
लेकिन तुझ कुर्सी पर चूं नहीं हुई।

वादे होते रहे करार होती रही
कुर्सी के लिए ललकार होती रही
लपका ली गयी कुर्सी उम्मीदें देकर
लपकाते समय कसमकसाई जरूर
लेकिन चूं फिर भी नहीं हुई।

@ बलबीर राणा 'अडिग'

Tuesday, 13 February 2018

सावन का अंधा


   शिव रात्रि के लिए हर परिवार तन मन धन से महीने दो महीने से तैयारी करते थे। मकान की साज सज्जा हो या घर में लूण तेल की व्यवस्था, परिवार के गार्जिन की प्रतिष्ठा मानो शिवरात्रि के त्योहार में सफल मेहमानबाजी पर निर्भर होती थी, क्योंकि शिव रात्रि पर्व पर पूरे बैरासकुण्ड क्षेत्र के हर परिवार में रिस्तेदारों के साथ उनके भी सगे संबधियों का जमवाड़ा होता है। नयें रिश्ते जोड़ना या यूं कहें कि इलाके में नयीं ब्वारी की खोज का पर्व ही शिवरात्रि का मेला था। लड़की या घर परिवार देखना इत्यादि सामाजिक परिवेश पर नयें रिश्तों की  को-करार होती थी। तब हम बच्चों का उल्लास सायद आज की पीढ़ी को मयस्सर नहीं हो पायेगा, गारंटी से कहता हूं। छः महीने से गुच्छी और अंटी (कंची) से पैसे जमा करना, मकान पर पुताई के लिए कमेड़ा (सफेद मिट्टी) और  लाल मिट्टी दूर के गांव से लाना, दरवाजों के लिए गोन्त (गोमूत्र) और चूल्हे की कीर से काला पेंट बनाना, घर आंगन की सफाई, राई पालक की क्यारी को पानी दे झक झक बनाना और मैले में क्या खरीदना और कौन रिश्तेदार आ रहा है और कितने रुपये देगा इस खुशी की संसद ख़्वाले ख़्वाले और स्कूल में चलती थी। शिवरात्रि की अगली रात को  घर में सबसे बड़ा त्योहार होता अर्थात अच्छा खाना हलवा खीर इत्यादि खाने को मिलता था क्योंकि अगले दिन सभी का ब्रत होता था। शिव को फलाहार चढ़ाने तक तो हम बच्चे भी ब्रत रखते थे दाने सयाने शाम को भगवान शिव की डोली मठ से मंदिर आने के बाद ही अन्न जल ग्रहण करते थे। सुबह घर में फलाहार बनता था जिसमें तेडू स्पेशल बेराईटी के साथ पिंडालू (अर्बी), राजमा, मुंगरी और चुवे (मरसों) का बनता था। भगवान शिव को यह फलआहार बिना नमक मशाले के चढ़ता है, शिव को चढ़ने के बाद नमक मशाले से उसे लजीज बनाया जाता हैं जिसके चटकारे लोग कई दिनों तक लेते थे। शिव रात्रि के दिन सुबह से मंदिर में जलाभिषेक के लिए तांता लग जाता है मंदिर के चारों तरफ पंचदेव परिसरों में स्थानीय पंडितों की पीली धोती और लंबे टिका देखते ही बनता था, ऊपर मठ (मुख्य पुजारी निवास)  से मंदिर में बिराजमान सभी देव थानों में पुजारी की आठों पहर पूजा का अपना ही महत्व होता है। परिसर में एक तरफ कीर्तन मंडली जम जाती अगले 24 घंटे के लिए। सिद्ध पीठ बैरासकुण्ड महादेव में शिवरात्रि महातम की सबसे खास बात है अंखड दिपक रखना, अखण्ड दिया निसंतान दम्पत्ति रखते हैं और लोगों का परम विश्वास आज भी है कि अखंड दिया रखने के बाद कोई भी दम्पत्ति आज तक निरास नहीं हुआ। इस प्रक्रिया में स्त्री 24 घंटे तक हाथ में जलता दिया रख तपस्या करती है बिना अन्न जल लिए यहां तक की 24 घंटे तक शरीर की जरूरी प्रक्रिया लघु या दीर्घ संका भी नहीं जाना होता है, मर्द जनानी की कुछ जरूरी मदद करता है जैसे मख्खी हटाना या नाक साफ करना कहीं पर खुजली करना इत्यादि, इस कठिन तपस्या का साहस अपने आप में दृढ़ मातृ शक्ति का द्योतक है। पट्टी मल्ला दशोली अब विकास खंड घाट में स्थित यह शिव स्थली नंदप्रयाग से 17 मील उत्तर में पंचजूनि पर्वत के तल पर लगभग 3 एकड़ समतल मैदान के बीच बना है। स्थान का भौगोलिक और मंदिर के ऐतिहासिक व पौराणिक पहलू को इस संस्मरण में उधृत नहीं कर पा रहा हूँ इस पर पूर्ण साक्ष्य के साथ बैरासकुण्ड महातम नाम से मेरी आने वाली किताब अभी अपूर्ण है शिव कृपा होगी तो एक आध साल में इसे में पाठको तक पहुंचा सकूंगा। हाँ तो मंदिर के विशाल मैदान में दो दिन तक  मंदिर समिति के तत्वाधान में मैला चलता था जो आज भी सतत चलता है मेले में स्थानीय लोगों द्वारा विभिन्न प्रकार की दुकाने लगाई जाती है, जिनमें बच्चों के खिलौने, महिलाओं के शृंगार के सामान और मिठाइयां प्रमुख होती थी। रात को धर्मशालाओं में बुजुर्ग महिलाओं द्वारा जागर बाहर मैदान में युवाओं द्वारा झुमैला चांचडी का अपना ही आनंद होता था, दिन भर मैले में बच्चों का कोतुहल बना रहता था। तब के दौर में हमारे क्षेत्र के लोगों के लिए इस मेले का महत्व वार्षिक उल्लास का था जो वर्तमान में औपचारिक सा प्रतीत होता है । संचार क्रांति के चलते अब मंदिर तक पक्की सड़क हो गयी आधुनिक भौतिक सुख सुविधायें पूर्ण उपलभद्द है अब मेले का स्वरूप भव्य और आधुनिक हो गया है हर वर्ष राज्य की कोई बड़ी हस्ती मेले का उदघाटन करने पहुंच जाते हैं अब मेला तीन दिन तक चलता है रात्रि में राज्य के बड़े कलककरों का द्वारा सांस्कृतिक प्रोग्राम होता है और दिन में जिला स्तरीय खेलों का आयोजन होता है जो कि क्षेत्र की तरक्की और युवाओं के शाररिक और बौद्धिक विकास के लिए शुभ संकेत है। उम्र के 18वें हेमंत में सेना में आने के बाद आज 24 वर्ष तक मेले में न जा पाना अखरता है इए लिये मेरी स्मृति में 80 और 90 के दौर का बैरासकुण्ड मेले का उल्लास आज भी वैसा का वैसा है, कहते हैं सावन के अंधे को हमेशा हरा भरा दिखता है।
@ बलबीर राणा "अडिग"

Saturday, 3 February 2018

बीस हजार की सिगरेट


 हठो हठो बामण जी आ गए उन्हें काम करने दो, बेहोस पान सिंह की माँ चैता रोती हुए बोली पंण्ज्यू कल देवी का डोला रखने गया था मेरा लड़का शाम को कडकडू (बेहोश) हो गया, भद्र डांडे बयाळ (बन देवी की हवा) लग गयी मेरे पानू पर, हे !! भगवान ठीक कर दो मेरे लड़के को जो मांगेगा दे दूंगा। पंडित जी ने गरुड़ पंख, कंडाली के पत्ते में राख और एक लोटे पर पानी मंगाया और अपनी पौथी निकाल झाड़ा (तंत्र कर्मकांड) डालने लग गया, ॐ हर दत्त को आदेश, डाकनी शाकिनी छू मंतर ॐ...होम क्रीं आँचडी-बयाल छू मंतर... बीच-बीच में सौलह वर्षी पान सिंह अचानक हिचक्की लेता और शांत हो जाता सभी लोग मंत्रों के असर का इंतजार कर रहे थे, बामण के मंत्र खत्म हो गए और कहा सब झाड़ दिया है बयाल का असर कुछ देर और रहेगा घबराने की बात नहीं मैं पूछ (देव अवतारी खोज) डालकर बताता हूँ कहाँ की बयाल है। पल डांडा (उधर का पहाड़ की) या वल डांडा (इधर के पहाड़ की)। तभी गांव के मास्टर जी कंपाउंडर को ले आये, उन्होंने नब्ज देखी हाल जाना और बी पी चैक करने के बाद गलूकोज स्लाइन लगा दिया और कहा गर्मी चढ़ी है मस्तिष्क में लगता है कुछ नशा किया इस मास्ता ने,  कौन थे रे साथ? साथ वाले क्या बताते सब ना नुकर कर पीछे छुप गए, मंगतु मन ही मन कह रहा था उस समय तो कमीना सिगरेट छोड़ ही नहीं रहा था, आते वक्त पूरे चार सिगरेट पियर सुल्पा (भांग) पिया अपने हाथ का सिरगाड़ वाला, लेकिन डर के मारे बताये कौन। बक्या ने भी दोखै (ऊन का बिछौना) में आसन लगा दिया, परिवार वाले और गांव के बड़े बूढे बक्या के सामने हाथ जोडे बैठ गए। ॐ थ्रू ॐ हट करते हुए पंडित जी ने गर्दन झटकते हुए चूल (चोटी) खोली और थाली से चांवल उछालते हुए कंपकंपी आवाज में कहा ऐड़ी....आँछड़ी...(बन देवियां) नहीं सिर.. सिर... गाड़ का मशाण (भूत) लगा है, इसका.. पैर...फिसला है...और शरीर... शरीर...में हिर्र...हिर्र हो गयी। तभी पीछे से मंगतु ने हाँ प्रभो सही है में स्वीकृति दे दी, वही पानसिंह के साथ डोली में आगे से लगा था, मना करता तो कंपाउंडर की दुबारा रेड पडती, पल्ला जो छुड़ाना था। शनिवार को दो बकरे के साथ मशाण पूजना तय हुआ, सिर गाड़ का मसाण खरतनाक होता है दो बकरे से कम नहीं मानता। सोबन सिंह ने पांच का सिक्का निकाला और पंडित जी को उच्चयाणा (बचन) करने को कहा। शाम तक पांच बोतल एन एस, डी एन एस दो इंजेक्शन एन्टी ड्रग के साथ चढ़ गए थे और पानसिंह ने आंखे खोल दी थी लोगों की भीड़ को एक टक देख रहा था चरस का नशा जो था। पंडित जी फिर दो बार झाड़ दे गए थे। दूसरे दिन गांव के लगभग सभी मर्द और सयाने बच्चे सिर गाड़ की धार (रिज लाईन) पहुंच गए आठ-आठ हजार के दो मस्त बकरे आ रखे थे, चैता कह गयी थी कमजोर बकरे मत लाना मेरा लड़का ठीक हो जाना चाहिए छक धिताणा (पूरी धीत देना) उस मसाण को। अगले दिन मसाण पूजा हुई सिरी-फट्टी (बकरे का सिर और एक टांग) बामण ले गया ऊपर से पांच सौ दक्षिणा, मैण-मसाले,  हलवा पूरी और पूरी दस लीटर कच्ची !भाई दो बकरे भी तो पचाने हैं, नहीं तो मसाण नहीं तूसेगा मीट घर ले जाना बर्जित है। मंगतू, देबू और करणि ऊंचे ढुंगे (पत्थर) में कचमोली (भुना हुआ कच्चा मीट) चाव से चबाते गप्प मार रहे थे, अरे बेटे पान सिंह की सिगरेट बीस हजार की पड़ गयी यार, अब नहीं करना ऐसा काम।
@ बलबीर राणा 'अडिग'

Friday, 2 February 2018

उठो पापा बक्से में क्यों सोये हो


घर में बहुत भीड़ लगी थी, एक तरफ माँ बिलख रही एक तरफ दादी, दादा एक कमरे में मौन सिर झुकाए बीड़ी पर बीड़ी सुलगाये जा रहा था, बड़ी बहन राजी जो मात्र 12 साल की थी सबक़े दुख की साझीदार हो रही थी सायद उसको कुछ आभास और समझ थी, कभी माँ के गले लग फ़फ़क्ति कभी दादी के आंसू पौंछती और कभी दादा की जलती बीड़ी हाथ से दूर फेंक रही थी। छः साल का वैभव समझ नहीं पा रहा था ये क्या हो रहा है ! सब लोग क्यों रो रहे हैं। उसके दोस्त भी अपनी माँ या दादी साथ आये थे वे भी चुप, जो भी आ रहा सर पर हाथ फिराता और रुआंसा मां दादी और दादा के पास जाते और सांत्वना देते, विधि का विधान है, भगवान अनर्थ हो गया, एरां बीर गति पा गया बीर सिंह, अपने को संभालो। घर के बाहर लोगों की भीड थी जिसमें मीडिया नेता, नजदीकी रिश्तेदार सभी थे। इतने में भारत माता की जय, बीर सिंह अमर रहे, पाकिस्तान मुर्दाबाद, बीर सिंह अमर रहे के नारे लगने लग गए। शहीद बीर सिंह का पार्थिक शरीर तिरंगे ताबूत में पहुंच चुका था, सलामी देने फौज का बैंड और बीस जवान एक जनरल साहब और कुछ ऑफिसर आये थे, किसी रिश्तेदार ने एक कंधे में ताबूत दूसरे कंधे में वैभव को उठा रखा था,  वह अबोध जनता के जोश के साथ हाथ उठा बीर सिंह अमर रहे के नारों को लोगों के साथ दोहरा रहा था। अंतिम दर्शन के लिए ताबूत खुला सबने बेहाली में दर्शन किये कोई वैभव को भी अंतिम दर्शन के लिए ले गए, बक्से में चिर निद्रा में पापा को देख वह मासूमियत से कह रहा था पापा उठो...उठो न !  इस बक्से में क्यों सोये हो? सुनो सब आपको अमर रहे कह रहे हैं, उठो न.... उठो.....रोवो चिल्लाओ मृत देह कहाँ आवाज देती है। उस अबोध को क्या पता था पापा मातृ भूमि के लिए हमेशा को अनंत यात्रा पर चले गए, अब कभी नहीं उठेंगे। इस दृश्य को देख पत्थर भी अपने आंशू नहीं रोक पाया रहा था।

@ बलबीर राणा 'अडिग'

Tuesday, 2 January 2018

वर्ष नया बन आता है

खुसी के कुछ पल वो संजो गया
कुछ दुखी क्षणों को वो दे गया
किसी की भर दी किताब उसने किसी के अध्याय अधूरे छोड़ जाता है
वर्ष नया बन आता है
उठ खड़ा हो जाग जरा 
उबासी को भगा जरा
पष्चिम से जिन्हे जाती देखा पूरब से वही बिपुल किरणो का झुरमुट फिर लुभाता है
वर्ष नया बन आता है।
वादे नयें कसम पुरानी
थी रानी या होगी रानी
सजा ना सका सिंहासन पर फिर बाहु पास में बाँधने को देखो कैसे सकपकाता है
वर्ष नया बन आता है।
धरा वही गगन वही
ना वो कहीं ना तू कहीं
संख्याओं की जमी परत से ये जीवन परमार्थ नहीं कमा पाता है
वर्ष नया बन आता है।
एक ही सन्देश उसका
एक ही आदेश उसका
नेक नियति संग कर्म कर भय्या इसलिए हर वर्ष मौका बन कर आता है
वर्ष नया बन आता है।
रचना:- बलबीर राणा 'अडिग'

नव वर्ष आगम अभिनंदन


आशाओं के दीप जले
जीवन उन्नति पथ बढ़े
निश्चल गंगा धार सी धवल
भावनाओं की पाती बहे
महके जीवन वाटिका
खुशियों का मृदंग बजे
आगोस में हो प्रेम बन्धन
नव वर्ष आगम अभिनंदन।
उन्नत हो खेत खलियान
बाग-बगवान खूब फले
हरित रहे धरा माँ आँचल
हर घर सुत समभाव पले
राष्ट्र हित में कर्म साध्य हो
नव सृजन कीर्तिमान गढ़े   
न हो आपदों का क्रंदन
नव वर्ष आगम अभिनंदन।
न छिने किसी बाल का बचपन
वृद्धों का ससम्मान बना रहे
मान मर्यादा जन पल्लवित हो
मानवता हर हृदय गम रहे
देश प्रतिभा विश्व पटल छाये
ज्ञान विज्ञान परमचम लहराए
महकता रहे भारतवर्ष आँगन
नव वर्ष आगम अभिनंदन।
आगम = आविर्भाव  
@ बलबीर राणा ‘अडि

Tuesday, 7 November 2017

स्मरण उस सादगी का


       रंगकर्मी, साहित्यकार, कार्टूनिस एवम कविता पोस्टर विधा के महान चित्रकार,  श्रद्धेय श्री बी मोहन नेगी जी बसर्ते आज बैकुंठवासी हो गए लेकिन आपके कर्म आपको इस धरती पर जन्मान्तर को अमर कर गए। श्रद्धा से  शीष झुकता है उस तपस्वी के लिए जिसने सम्पूर्ण जीवन अपनी चित्र साधना के माध्यम से लोक समझ के व्यक्तियों को नयीं ऊर्जा से लबरेज रखा, आध्यात्मिक शुचिता और व्यसनों से मुक्त, भारतीय ऋषि परम्परा का निर्वहन करते हुए एक अनोखा संयमित जीवन जीने वाला चित्रकार जो कभी भी चर्चा में रहने को लालायित न रहा और न रहना चाहा। उनकी कला साधना जीवन की उस  गहराई को नापती हुयी जड़ तक जाती जहाँ से वास्तविक जीवन को पोषण मिलता है। न्यौछावर क्या होता है, न्यौछावर की असली परिभाषा जाननी हो तो श्रधेय बी मोहन नेगी जी कला साधना की धरोहर सहज चंद मिनट में समझा देती है।  बिना राजनैतिक पक्षधरता के, चाटुकारिता से दूर अपनी कुटिया में जीवन सार संचित करता एक महान कलाकार बिना स्वस्वार्थ के कर्म पथ पर जीवन पर्यन्त अडिग खड़ा रहा। लाभ-हानि से बिरक्त सत्ता के गलियारों में अपनी पहचान अंकित करने या सत्ताधीशों को रिझाने की छटपटाहट सोयी रही जगी रही तो वो चेतना जो मात्र कर्म जानती है फल नहीं। छोटे पहाड़ी कस्बों में कला साधना में डूबा कलावंत आज सेकड़ों कविता पोस्टर, रेखाचित्र, कोलाज, मिनिएचर्स, कार्टून आदि धरोहर धरती पर आने वाली पीढ़ी के लिये सहेज गए हैं। श्रधेय नेगी जी की सृजनता ने उत्तराखंड के साथ दुनीयां के कवियों की कविताओं को चित्र कलेवर में अमरत्व दिया है, श्रधेय नेगी जी सदैव अपनी चित्रकला और बोधपरक कबिताओं से सोई व्यवस्था और समाज जागृत करते रहे। निरन्तर सक्रीय और लगातार, लगातार दिन रात लगन में मगन भगवान् ने कौन सी देह बनायी थी कि बिराम उनसे हमेशा डरता रहा। श्रधेय बी मोहन नेगी जी को लगभग युवावस्था में आने के बाद ही जाना, 2013 से सोशियल मीडिया के माध्यम से भैजी से इनडारेक्ट संवाद बना रहा लेकिन व्यग्तिगत फोन पर 2014 से। सैन्य जीवन के अभिर्भाव से उनके साक्षात सम दर्शन नहीं कर पाया और हर छुट्टी में लालसा रहती थी कि अबकी बार जरूर पौड़ी जाऊंगा पर संभव नहीं हो सका किसी को कहां आभास होता कि चलता फिरता आदमी सडन अलविदा कह देंगा। श्रधेय नेगी जी की चित्रकला का अवलोकन साहित्य क्षेत्र में आने के बाद ज्यादा रहा उनके हर चित्र और पोस्टरों में जीवंत जीवन आयाम होता है इसे कला पारखी अच्छी तरह समझते हैं, एक दिन भी साधना को बिराम देना उन्हें सायद अखरता होगा इस लिए एक नार्मल निमोनियाँ उन्हें न लीलता। इतने लम्बे समय तक बिना किसी रिटर्न या दाम के और अपने कला साहित्य योगदान के मुकाबले किसी बड़े सम्मान से ताज्य रहकर भी निरन्तर साधना रत रहना बिरले ही लोगों के बस का होता है। बिना फायदे के पूरा जीवन किसी काम में खपा देना गृहस्थ आदमी के बस का कम ही होता है लेकिन उन्होंने गृहस्थ की अच्छी पारी खेलने के साथ कला की पिच को बखूबी सम्भाला और अभी सिर्फ प्रथम पारी का खेल मानते थे कि मृत्यु लोक का दाना पानी खत्म हो गया।
            2014 की बात है मेरी और भुला महेंद्र राणा जी की साजी कबिता पोथी खुदेड डंडयाली जब श्रधेय बी मोहन नेगी जी के पास पहुंची तो भैजी का घर में फोन आया क्योंकि घर का ही स्थायी  संपर्क नम्बर हमने किताब में दिया था, हेलो!!!! कु घोर ह्वलु  बड़ा राणा या छवटा राणा कु? घोरवाली फोन रिसीब करि जी नमस्ते, जी मैंन पचछ्याणी नि कै बड़ा छवटे बात कना क्योंकि मैं अकेला भाई हूँ इस लिए श्रीमती को संसय हुआ। आप बलबीर राणा जिक का घोर बटिन ब्वना भुली?  मैं बी मोहन नेगी बुनु पोड़ी बटिन, राणा जीओं की किताब मिली मिते, सायद श्रीमती जी का परिचय न था भैजी से उसने जी भैजी में ही जवाब दिया, कख च राणा जी? वुं ड्यूटी पर छ, कख ह्वली ड्यूटी अज्कयाल? जी कश्मीर मा छ, अच्छा भुला तेँ मेरु आश्रीवाद और किताब की शुभकामनाएं दये दियां। दूसरे दिन जब श्रीमती जी ने बताया की कल पौड़ी से बी मोहन नेगी जी फोन आया था और बधाई दी, भली मिठ्ठी भौंण छी वों की। मन गद गद हो गया और दूर बॉर्डर पर एक सहज व्यक्तित्व की मूर्ति का चित्र अपने सामने महसूस करने लगा, यह मेरी कलम की चाटुकारिता नहीं बल्कि अपने संसारिक समझ के विपरीत एक अहसास था क्योंकि भैजी मेरी दृष्ठि में इससे पहले रसुखी व्यक्ति थे उनकी सहजता का अनुमान नहीं था इसलिए भी कि मैंने उन्हें किताब नहीं भेजी थी, जब भेजी ही नहीं तो फोन आने का सवाल ही नहीं लगता था, लेकिन बाद में पता चला कि महेंद्र भाई ने भैजी थी क्योंकि उनकी मुखा भेंट पहले भैजी से हुई थी। उसी दिन घर से भैजी का फोन नम्बर लिया और तुरन्त उन्हें कृतज्ञ मन से फोन किया, फोन पर उनकी मृदुलता ने उनकी आत्मीय सहजता की छवि को मेरे मानस पटल पर अंकित किया, तब से लगभग बराबर फेसबुक पर उनकी यात्रा किसी फोटो और पोस्टर पोस्ट विशेष पर फोन से भी बात करता रहता था, सितंबर 2017 में जब भैजी के बीमार होने की खबर मिली, फोन से हाल जाना तो  बोले भुला ठिक ही छों चिंता न करा, जरा यु खांसी नि जाणि, अब काफी सुधार च, खाणु बी खाणु छों, भुला आप बड्या लिखद कबिता जरा छवटी लिखण, क्या पता था भैजी की वह अंतिम सीख और आवज होगी और इतने जल्दी मुझे इस बॉर्डर पर मेरे आई कन की अनंत दिव्य यात्रा पर जाने की खबर मिलेगी। और मेरी आने वाली कबिता भैजी के कुची से वंचित हो जाएगी। नमन ऐ महान साधक, कोटिस श्रद्धा सुमन, भगवान आपको अपने चरणों में चिर शांति दे।